Saturday, 24 September 2016

स्वामी जी को सफलता नहीं मिली

स्वामी जी को सफलता नहीं मिली

    स्वामी दयानन्द जी ने देखा कि हिन्दू समाज को धर्म के नाम पर पाखण्ड, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का शिकार बना दिया गया है। वह ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और धर्म के मर्म से वंचित हो गया है। अज्ञानी लोगों ने धर्म को व्यवसाय बना लिया है। वे मूर्तिपूजा और ग्रहपूजा के नाम पर लोगों से रूपया वसूल कर रहे हैं। स्वामी जी ने अपनी जान ख़तरे में डाली और धर्म के धंधेबाज़ों का विरोध किया। निःसंदेह यह उनका अच्छा प्रयास था लेकिन उनकी कोशिशों से मूर्तिपूजा और ग्रहपूजा आदि बंद नहीं हुई।
स्वामी दयानन्द जी सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि वसुओं और सृष्टि की उत्पत्ति से परमेवर का वास्तविक प्रयोजन नहीं जान पाए।
स्वामी जी वेद और मनु-स्मृति की रचना काल जानने में भी असफल रहे।
स्वामी जी ने मनुष्य की उत्पत्ति का जो काल बताया है, उसे भी आधुनिक विज्ञान ने ग़लत सिद्ध कर दिया है।
स्वामी जी मानते थे कि हिन्दू समाज का भला वर्ण व्यवस्था की ऊँचनीच और छूतछात को मानने में है। इसीलिए उन्होंने वैदिक धर्म के नाम पर वर्ण व्यवस्था की स्थापना की कोशिश की लेकिन वह इस काम में भी सफल न हो सके।
न्याय के लिए अपने ही वर्ण के गवाहों को लाने और क़ातिल को बिना विचारे मार डालने की बात कहकर वह न्याय की अवधारणा को समझने और समझाने में भी असफल रहे।
स्वामी जी अपना वास्तविक जन्म स्थान और जाति छिपाने में सफल रहे।
स्वामी जी का बताया वेदमंत्र भी यजुर्वेद में नहीं मिल पाया।
वह अपने कल्पित वेदार्थ के अनुसार गुदा से सांप लेने में भी असफल रहे।
स्वामी जी श्वास-प्रश्वास की भांति सुबह-शाम हवन करने में भी असफल रहे।
अग्नि आदि तत्वों की उत्पत्ति को भी वह समझ न पाए और ग़लत विवरण देकर चले गए।
वह अमर भी न हो पाए और न ही मृत्यु समय के कष्टों से बच पाए।
न उन्हें कोई ‘योगी गुरु’ मिला और न ही उन्हें ‘सच्चे शिव’ के दर्शन हुए, जिसके लिए वह घर से निकले थे।
वेदों को भी वह समझ नहीं पाए और ग़लत अर्थ कर गए।
संसार के क़ैदखाने से भी किसी को मुक्ति न दिला सके बल्कि वह खुद ही मुक्ति न पा सके।
हिन्दू धर्म नगरियों के विद्वानों से उन्होंने शास्त्रार्थ ज़रूर किया लेकिन किसी एक नगर के विद्वानों से या आम नागरिकों से भी वह अपनी मान्यताएं मनवाने में असफल रहे।
उन्होंने अपने शिष्यों से अपनी मान्यताओं का पालन करवाने में असफल रहने को भी स्वयं स्वीकार किया है।
वह अपने प्राण गंवाने का कारण भी न बता पाए।
उनका वेदभाष्‍य भी अधूरा ही रह गया।
उन्होंने दूसरा जन्म लेकर उसे पूरा करने की बात कही लेकिन वह दूसरा जन्म भी यहां नहीं ले पाए क्योंकि आवागमन होता नहीं है।
उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की लेकिन वह भी अपनी स्थापना के उद्देश्य से भटक गया है-
‘किन्तु हमारी शिरोमणि सभा अभी तक हठतावश मयासुर के मार्ग पर चल रही है।’ (उपक्रमणिका, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पृष्ठ 8)

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डा. अनवर जमाल की पुस्तक "'स्वामी दयानंद जी ने क्या खोजा? क्या पाया?" परिवर्धित संस्करण  PDF इधर से भी डाउनलोड की जा सकती है --पुस्तक में108 प्रश्न नंबर ब्रेकिट में दिये गए हैं
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सच्चे गुरु की खोजः वर्तमान समाज की ज़िम्मेदारी

सच्चे गुरु की खोजः वर्तमान समाज की ज़िम्मेदारी

    स्वामी जी के दर्शन और उनके जीवन को देखने के बाद एक ऐसे आदमी की तस्वीर सामने आती है जो कि अपने मिशन में पूरी तरह असफल रहा। अपने अज्ञान और हठ के कारण वह विधवाओं, शूद्रों और मुसलमानों को उनके मानवोचित अधिकारों से वंचित करते रहे। इसे समाज सुधार नहीं कहा जा सकता। जो उन्हें अपना गुरू मानते हैं, वे भी उनके मार्ग पर चलने में, वैदिक संस्कारों का पालन करने में असफल रहे। एक गुरू की ज़रूरत मानव मात्र को हमेशा से रही है और आज भी है।
वह कौन है? आर्य बन्धुओं के लिए यह खोज का विषय है क्योंकि यह प्रमाणित हो चुका है कि स्वामी दयानन्द जी को अपनी खोज में कोई सच्चा गुरु न मिला और वह स्वयं भी इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर पाए। उनके जीवन के कटु अनुभवों और वेदार्थ को समझ पाने में उनकी और उनसे पूर्व के भाष्यकारों की नाकामी से पता चलता है कि वैदिक आर्य जाति काफ़ी समय से वास्तविक और पूर्ण ज्ञानी गुरू से रिक्त है। यह दुखद है, लेकिन सच यही है।
इसके बावजूद हमें यक़ीन है कि सम्पूर्ण भारत जल्द ही अपना खोया हुआ धर्म, सत्य और गौरव प्राप्त कर लेगा क्योंकि भारतवासी स्वभाव से ही ज्ञानाकांक्षी हैं। ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में अब जाति, भाषा और राष्‍ट्र की बेबुनियाद दीवारें भी ढहती जा रही हैं। मशहूर चीनी कहावत है कि
‘जब विद्यार्थी तैयार हो जाता है तो गुरू उपस्थित हो जाता है।’

¤ जो ढूंढता है वह पाता है लेकिन ...
    गुरू की खोज का अभियान जारी रखिये क्योंकि जो ढूंढता है वही पाता है। उन जगहों पर भी तलाश कीजिए जहाँ अभी तक तलाश न किया हो। हो सकता है कि सच्चा गुरू उस रूप में और उस परिधि में मिले जिसकी कल्पना भी न की हो। सच्चा गुरू उस वेश-वंश, देश और भाषा में मिले जिसे स्वीकारना निजी अहंकार और गर्व पर चोट करता हो। बहरहाल कल्याण के लिए सच्चा गुरू अनिवार्य है। अब वह जैसे भी मिले और जहाँ भी मिले।
‘धर्म को साक्षात करना और सब विद्याओं का यथावत जानना’ उसका मूल लक्षण है। आप उसे इस लक्षण से पहचान जाएंगे। ऐसे ही ‘आप्त पुरूड्ढ’ के उपदेश को मानने के लिए स्वयं स्वामी दयानन्द जी भी कह गए हैं-
‘जो पृथिवि से लेके परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करना और उसी के अनुसार वत्र्तना है इसी का नाम आप्ति है, इस आप्ति से जो युक्त हो उसको ‘आप्त’ कहते हैं। उसी के उपदेश का प्रमाण होता है, इससे विपरीत मनुष्य का नहीं.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोत्पत्ति., पृ.14)
देखिये, जानिये, सोचिये, समझिये और फिर फैसला कीजिए क्योंकि आपके फैसले से ही आपका भविष्‍य निर्धारित होता है। आपके विचार से ही आपके कर्म फूटते हैं और अपने कर्मों का फल भी आपको स्वयं ही भोगना है। आप सत्य की खोज और स्वीकार के मार्ग पर आगे बढ़कर अपना जीवन स्वर्ग बनाना चाहते हैं, मुक्ति, आनंद और ईश्वर पाना चाहते हैं या फिर घृणा, तिरस्कार और अपने अंहकार की ऊंची दीवार से ही सिर टकराते रहना चाहते हैं?
पानी वहीं मिलेगा जहाँ  कि वास्तव में वह मौजूद है। ‘मृगमरीचिका’ से किसी को आज तक पानी नसीब नहीं हुआ तो आपको कैसे मिल जाएगा?

¤ ढूंढिये, लेकिन वहाँ, जहाँ कि वह सचमुच है
    (107) ‘...सत्य असत्य के ग्रहण व त्याग करने में सदा उद्यत रहने वाले आर्य क्या दूसरों को ही उपदेश देते रहेंगे? क्या वे स्वयं सत्य पक्ष को ग्रहण करने में हठवश संकोच ही करते रहेंगे ?’  (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पृष्ठ 7)
(108) ‘‘क्या ऐसे व्यक्ति वेद की ‘असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः’ इस व्यवस्था से बच सकेंगे?’’ (सत्यार्थप्रकाश, प्रकाशकीय पृष्ठ)

¤ वैदिक विज्ञान से सत्य ढूंढना सीखिए
   ‘मनुष्‍य का आत्मा सत्याऽसत्य का जानने वाला है’ (सत्यार्थप्रकाश, भूमिका, पृष्ठ 2)
‘‘यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यत।। यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है।
जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी से बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। (सत्यार्थप्रकाश, प्रथमसमुल्लास पृष्ठ 13)
यह सत्य है। आधुनिक विज्ञान ने चेतन और अवचेतन मन पर शोध करके बताया है कि यदि आप शंका और दुविधा के कारण कोई फ़ैसला नहीं कर पा रहे हैं तो आप सही फ़ैसले पर पहुंचने का संकल्प करके उस मामले को अपने अवचेतन मन के हवाले कर दीजिए। आप सही फ़ैसले पर पहुंच जाएंगे। अवचेतन मन से सोने से ठीक पहले और सुबह को जागने के ठीक बाद सबसे अच्छी तरह काम लिया जा सकता है।
आप रात को सोते समय अपने ्यरीर के सभी अंगों को शिथिल कर लीजिए। अब सत्य पाने की सच्ची कामना के साथ, अधिकारपूर्वक बार-बार दोहराएं कि
‘मेरी आत्मा सत्य को जानती है। मैं निष्पक्ष हूँ और सत्य-मार्ग पर चलता हूँ।’
आप इस की एक माला भी जप सकते हैं यानि 108 बार। फिर आप धीरे धीरे प्रेमपूर्वक ‘सत्य, सत्य, सत्य’ कहते हुए नींद में चले जाएं। इस क्रिया को नित्य कीजिए। आपका अवचेतन मन इस पर प्रतिक्रिया करेगा और वह आपके जीवन में सत्य के मार्ग पर जाने की परिस्थितियाँ प्रकट कर देगा। जब आपका चेतन मन सो जाता है, तब भी आपका अवचेतन मन जागता रहता है। यह सृष्टि नियम है। यह महान वैदिक विज्ञान है। आप इस वैदिक रीति से सत्य का सीधा मार्ग आसानी से पा सकते हैं।

सत्य को अरबी में ‘हक़’ कहते हैं। हक़ अल्लाह का एक नाम भी है। वैदिक बन्धु भी सत्य को ईश्वर का एक नाम मानते हैं। यह बिन्दु दोनों को एक कर देता है। इल्मुल आदाद के अनुसार हक़ शब्द के अदद 108 हैं और हिन्दुओं की माला में भी 108 दाने होते हैं। ‘हक़’ नाम के जाप से मुस्लिम सूफ़ी बड़े बड़े काम लेते हैं। जिन्हें अल्लाह के नाम और उनका अर्थ बताने वाली किताबों में देखा जा सकता है। 

सत्य और रहस्य आपके सामने प्रकट हो चुका है। अब करना आपको है और पाना भी आपको ही है। 

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Wednesday, 14 September 2016

सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों पर वेद और वैदिक आर्य?

सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों पर वेद और वैदिक आर्य?

इसकी पुष्टि एक दूसरे प्रमाण से भी होती है, जहाँ दयानन्द जी ने यह कल्पना कर डाली है कि सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रादि सब पर मनुष्‍यादि गुज़र बसर कर रहे हैं और वहाँ भी इन्हीं चारों वेदों का पाठ किया जा रहा है। उन्होंने अपनी कल्पना की पुष्टि में ऋग्वेद (मं0 10, सू0 190) का प्रमाण भी दिया है-
‘जब पृथिवी के समान सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात उनमें इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुष्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्‍य होंगे?’ (सत्यार्थ., अष्टम. पृ. 156)
(22) क्या यह मानना सही है कि ईश्वरोक्त वेद व सब विद्याओं को यथावत जानने वाले ऋषि द्वारा रचित साहित्य के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहों पर मनुष्‍य आबाद हैं और वे वहां वेदपाठ और हवन कर रहे हैं?
(23) चन्द्रमा पर कई वैज्ञानिक जाकर लौट आए हैं। सेटेलाइट के ज़रिये चन्द्रमा
के हर हिस्से के फ़ोटो ले लिए गए हैं। वहां अभी तक तोप और बन्दूक़ बनाने वाली कोई फ़ैक्ट्री क्यों नहीं मिल पाई?
(24) क्या सूर्य पर वेदपाठी आर्यों के रहने और तोप और बन्दूक़ें रखने की बात कहना पौराणिकों से बड़ी गप्प मारना नहीं कहलाएगा? 
    अतः सत्यार्थप्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आर्य समाजियों के पुराण सिद्ध होते हैं।
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Tuesday, 13 September 2016

आर्य के काल्पनिक ईश्वर के गुण ( Latest ) :-

आर्य के काल्पनिक ईश्वर के गुण ( Latest ) :-
(१)किसी लोक में रहता  है ।
(२) संसिकृत भाषा में बात करता है ।
(३) बात बात पर चिढ़ जाता है ।
(४) देवता से सारे काम करवाता है ।
(५) औरतों का बड़ा शौकीन है ।
(६) भुलक्कड़ है कुछ भी कहकर बाद में भूल जाता है ।
(७) औरतों ( अप्सरा) की दलाली करता है, और सडातानी को औरतें सप्लाई करने का काम करता है ।( दल्लावेद)
(८) ब्रह्मदिवश और नास्तिक बनाता है और उनसे डरता भी बहुत है ।
(९) बात बात पर मौत की धमकियाँ देता रहता है और जानवर की योनि में पैदा करने का डर दिखाता रहता है ।
(१०) अपनी ही बात से मुकर जाता है ।
(११) ब्रह्सेमदिवश से  लड़ने के लिए sadatani को अवतार  की सेनायें भेजता है ।
(१२) औरतों के बलात्कार करवाता है ।
(१३) छोटी बच्चियों से बुड्ढों की शादियाँ करवाता है ।
(१४) टाइगर भेड़िया से नफरत करता है ।
(१५) जानवरों को कटवा कर उनकी बलि कर बहुत खुश होता है ।
(१६) असुर नामक चीज़ से बहुत डरता है ।
(१७) छोटी छोटी बात पर नाराज़ हो जाता है ।
(१८) मूर्ती पूजकों से बहुत चिढ़ता है और उनको देख तक नहीं सकता ।
(१९) बार बार पहले गलत मन्त्र करता है फिर उनको सही करने के लिए दूसरे मन्त्र करता फिरता है।
(20) अपना सन्देश किसी के दिल पे उतारता है और ज़मीन वालों को अपनी शक्ल नही दिखाता।
(21) शराब खोरी औरत खोरी के लिए मनुष्य को उकसाता है और मनुष्य योनि का लालच देता है ।
(२२) अपनी बात को साबित करने के लिए कुछ भी बकता फिरता है और किसी की भक्ति में लींन रहता है ।
(२३) ब्रह्मदिवश से इतनी नफरत करता है कि उनको जानवर के मुह में डालने को कहता है।
(२४)ब
ब्रह्मदिवश और नास्तिक को खुद ही गुमराह करता है और खुद ही सज़ा भी दे देता है ।
(२५) ब्रह्मदिवश और नास्तिक को खुद ही वेद नही समझने देता फिर उन्हें जानवर बनाता है।
(२६) रोज़ दिन में कम से कम पाँच भक्तों का हवन बड़े शौंक से देखता है ।
(२७) कभी कभी तो अपने को साबित करने के लिए यही भूल जाता है कि वो कौन है और खुद को साकार निराकार हाथ पैर वाला बताने लगता है ।
(२८) सूरज को 7 घोड़े से खिंचवाता है ।
(२९) सूरज को समुन्दर से निकालता है ।
(३०) अपने अवतार को अजीब अजीब जानवर की शक्ल बना के फिर उन्हें सुवर उल्लू गधा घोडा गाय चोहा पे बैठा के दुनिया में दुनिया में भेजता है।।


#भक्त_को_जवाब_भक्त_की_जुबान_में

सत्यार्थ प्रकाश या अज्ञानता का प्रकाश -  

सत्यार्थ प्रकाश या अज्ञानता का प्रकाश -  

:D

ना ज्ञान ना विज्ञान सिर्फ अज्ञान ही अज्ञान है गालिब

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी
एकादश समुल्लास में एक प्रश्न का उतर दे रहे हैं

प्रश्न ये है के ये जो आकाश में नीला रंग दिखाई
देता है वो क्या है ? क्या ये पदार्थ है ???

स्वामी जी उत्तर देते है के ये जो नीला आकाश
दिखाई दे रहा है वो असल में पृथ्वी से उड़ा हुआ
जल है !! जो दूर दूर तक नीला तम्बू(आकाश) देखी
देता है वो जल चक्र है !!!

:D 

आर्य समाज मानता है के ये जो नीला आकाश है
वो जल है ,अर्थात ये जो आकाश का नीला रंग है
जल के कारण है ...

:D 

सवाल ये है के अगर जल
के कारण आकाश नीला है तो मेघ काले या सफ़ेद
क्यों होते हैं नीले क्यूं नहीं ??

मेघों में तो बहुत
सारा जल होता है पर फिर भी वो नीले नहीं
दीखते !!

अल्बर्ट आइंस्टीन ने सिद्ध किया था के ये जो नीला रंग है वो जल के कारण नहीं
है बल्कि जब सूर्य की किरणे वायुमंडल पे गिरती हैं तो ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के कणों से टकराती है तीन रंगों में विभाजित हो जाती
हैं ...
ये नीला रंग भी उनमें से एक रंग है क्या आप देखते नहीँ की आकाश का रगँ कभी नीला कभी सफेद सा हो जाता है वो वायुमंडल पर गिरती किरणोँ के कारण है ।

क्या आर्य समाज स्वामी दयानंद जी की गलती
स्वीकार करता है नहीँ बल्कि अधोँ की तरह उनके पिछे चलता है ।

क्या आर्य समाज सत्य का
साथ देता है या फिर झूठ का ? आर्य समाज के सस्थाँपक 5th फेल स्वामी जी असत्य , अज्ञानता , मुर्खता , अहकारीँता , अविज्ञानता का  प्रकाश कर के गये है आर्यो मे जिसकी वजह से आज आर्यो की सखयाँ आटे मे नमक जितनी रह गयी ।

सत्य ही ईश्वर है ...

जो सत्य को नहीं मानते तो
उनकी ईश्वर की उपासना भी सची कैसे हो सकती है ?

स्वामी जी की अज्ञानता और धुर्तता तो देखीय आकाश का रगँ पानी के कारण नीला , जबकि छोटा बच्चा भी जानता है । 5th Class का भी कि पानी का कोइ रगँ ही नहीँ । 

ऐसे अज्ञानी और मुर्ख को महर्षी कहने वाले समाजीयोँ डुब मरो चुलु भर पानी मेँ । 

ये लो साइट ~

www.sciencemadesimple.com/sky_blue.html

Monday, 5 September 2016

आर्य समाज से 108 सवाल ?

आर्य समाज से 108 सवाल ?

डा. अनवर जमाल की पुस्‍तक "'स्‍वामी दयानंद जी ने क्‍या खोजा? क्‍या पाया?" परिवर्धित संस्‍करण पर आधारित ब्लाग, अन्‍य लेख पढने के लिए देखें vedquran.blogspot.in

Wednesday, April 8, 2015

पहली किस्‍त चार में से swami-dayanand-ne-kiya-khoja-kiya-paya-second-edition-Part-1

Unicode Book ‘‘स्वामी दयानन्द जी ने क्या खोजा, क्या पाया?’’ परिवर्धित संस्‍करण
डा. अनवर जमाल  ( पी डी एफ mediafire और  archive  से  प्राप्‍त कर सकते हैं)
--स्वागत----

डा. अनवर जमाल साहब की पुस्तक ‘दयानन्द जी ने क्या खोजा, क्या पाया?’ का प्रथम संस्करण अगस्त 2009 में प्रकाशित हुआ। इसका सभी वर्ग के पाठकों द्वारा जिस उत्साह के साथ स्वागत किया गया। उसने बहुत जल्द इसके दूसरे संस्करण की ज़रूरत पैदा कर दी लेकिन डाक्टर साहब की व्यस्तता के चलते यह काम समय लेता चला गया। अब इसी पुस्तक का दूसरा संस्करण आपके हाथों में है। इस नए संस्करण के टाइटिल में आर्य समाज के संस्थापक के नाम के साथ स्वामी शब्द की वृद्धि कर दी गई है क्योंकि वेद-क़ुरआन साहित्य के रचयिता एक बड़े मुस्लिम आलिम ने ऐसा करने के लिए कहा था। उचित सलाह देने और उसकी क़द्र करने की यह एक अच्छी मिसाल है। इस नए संस्करण में बहुत से ऐसे तथ्य और दे दिए गए हैं जो कि पहले संस्करण में नहीं हैं। इस तरह यह प्रथम संस्करण से अलग एक नई पुस्तक बन गई है कि अगर दोनों पुस्तकें साथ-साथ छपती रहें तो भी दोनों अपनी जगह पूरा नफ़ा देती रहेंगी।
    यह पुस्तक हिन्दी साहित्य में अपनी तरह की पहली पुस्तक है। जिसमें डा. अनवर जमाल साहब ने स्वामी दयानन्द जी के सिद्धान्तों की व्यवहारिकता को स्वयं स्वामी जी के जीवन के दर्पण में देखने का प्रयास किया है। इस कार्य के लिए उन्होंने काफ़ी रिसर्च की है। उनकी रिसर्च का उद्देश्य आर्य समाज मत के संस्थापक को दोष देना  नहीं है बल्कि उन अवरोधों को चिन्हित करना है l जिन्हें हटाने का स्वाभाविक परिणाम वैदिक धर्म और इसलाम के मानने वालों के बीच क्रमशः एकता और एकत्व की स्थापना है।
लेखक ने अपने शोध में पाया है कि सबका ईश्वर और सारी मानव-जाति का धर्म एक ही है, दोष यदि कहीं है तो मतभेद के कारण है और यह मतभेद दार्शनिकों और आलिमों की निजी व्याख्याओं के कारण है। ईश्वर के ज्ञान और उसकी विशाल प्रकृति के सभी रहस्यों को कोई सामान्य मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से बिल्कुल ठीक ठीक जान ले, यह संभव नहीं है। समय के साथ ये मतभेद स्वयं ही दूर होते जा रहे हैं, यह हर्ष का विषय है। हम इन परिवर्तनों को जागरूक होकर अंगीकार कर सकें तो हिन्दू-मुस्लिम चेतना के एक होने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी। जिसके असर से पूरी दुनिया में फैले हुए हिन्दू-मुस्लिम एक अजेय शक्ति बन जाएंगे। इसके बाद भारत पूरे विश्व का नेतृत्व करने की शक्ति सहज ही अर्जित कर लेगा। इस महान एकता में बाधक बनने वाले विचारों को ईश्वर की प्रकृति सुप्त और मृत करते हुए भारतीय चेतना का परिमार्जन निरन्तर कर ही रही है। 
    ‘बल्कि हम तो असत्य पर सत्य की चोट लगाते हैं तो वह उसका सिर तोड़ देता है। फिर क्या देखते हैं कि वह मिटकर रह जाता है और तुम्हारे लिए तबाही है उन (असत्य) बातों के कारण जो तुम बनाते हो।’ -क़ुरआन 21,18
       सो सभी के लिए ज़रूरी है कि इस काल क्रिया को गंभीरतापूर्वक लें और इसे समझकर अपना भरपूर सहयोग दें। मतभेद वाले मुद्दों पर ज़ोर देने के बजाय वेद-क़ुरआन के समान सूत्रों पर मिलकर काम करने से समाज में प्रेम और सहयोग की भावना बढ़ेगी। यह निश्चित है। इसी सराहनीय उद्देश्य के लिए यह पुस्तक लिखी गई है।
    देश की उन्नति और मानव एकता के लिए काम करने वाले बहुत से भाईयों ने हमारे पते पर संपर्क करके यह पुस्तक प्राप्त की और उन्होंने इसे विद्वानों तक पहुंचाया। ऐसे भाईयों में ख़ास तौर पर मास्टर अनवार अहमद साहब, पुराना बाज़ार, हापुड़ उ. प्र., मोबाईल नं. 08909003427 और जनाब शफ़ीक़ अहमद साहब, ज़िला सहारनपुर का नाम लिया जा सकता है। उनके ज़रिए से यह पुस्तक बहुत से आर्य विद्वानों तक पहुंची। विद्वान लेखक के साथ हम मास्टर साहब का भी शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने लेखक महोदय के द्वारा एक आर्य भाई कर्म सिंह शास्त्री जी के सवालों के जवाब में सौ पृष्ठ से ज़्यादा लिखे उनके एक विस्तृत जवाबी पत्र को पढ़ लिया, जिसे वह 8 वर्षों से अपनी अलमारी में रखे हुए थे। मास्टर साहब के बहुत आग्रह पर उन्होंने अपने इस शोध-पत्र के चन्द ख़ास बिन्दुओं को एक संक्षिप्त पुस्तक का रूप दे दिया जो कि बहुत सी ग़लतफ़हमियों को दूर करने का सशक्त माध्यम बन रही है। इंटरनेट के कारण इस पुस्तक को देश के साथ साथ विदेशों में भी पढ़ा और सराहा गया है। इस नवीन संस्करण को भी गूगल सर्च के माध्यम से आसानी से तलाश करके पढ़ा जा सकता है। पुस्तक का लिंक मंगवाने और उचित सुझाव देने के लिए भी पाठक ईमेल कर सकते हैं।
    ‘गायत्री मंत्र का रहस्य’ (अभी तक 3 भाग) डाक्टर अनवर जमाल साहब की एक और अद्भुत लेखमाला है, जिसमें उन्होंने इस वेद-मंत्र का ठीक शाब्दिक अनुवाद करने में सफलता पाई है। यही पहला और सही शाब्दिक अनुवाद वह कुंजी है जिससे मंत्र का पाठ करने वाले की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक चेतना का विकास एक साथ होता है और तुरंत से ही होना शुरू हो जाता है। उन्होंने इसमें तर्क सहित गायत्री मंत्र पर उठने वाली सभी गूढ़ आपत्तियों का निराकरण कर दिया है। इंटरनेट पर उनकी यह लेखमाला देखकर हमारा दिल चाहता है कि डाक्टर साहब गायत्री मंत्र पर अपने इस अमूल्य शोध को भी एक पुस्तक का रूप देकर सबके लिए उपलब्ध करा दें ताकि गायत्री मंत्र से लगाव रखने वाले सभी मनुष्यों का भला हो।

डा. अयाज़ अहमद
हिन्दी ब्लॉगर व सम्पादक ‘वन्दे ईश्वरम्’ मासिक
11 सितम्बर 2014
मेन मार्कीट, 117 साबुनग्रान 
देवबन्द, उ. प्र.  247554                                                    
email:  ayazdbd@gmail.com                                                                         
blogs:
drayazahmad.blogspot.in
vandeishwaram.blogspot.in
                                                        
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प्रस्तावना
       यह विश्वविदित है कि परम आदरणीय ईशदूत मुहम्मद साहब (सल्ल.) पर इस्लाम धर्म का पवित्र धार्मिक ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित हुआ। सम्भवतः इसी कारण उनकी शिक्षाओं के विषय में भारत वर्ष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में नर-नारियों की रुचि बढ़ती गई और इसी कारण से इस्लाम धर्म फलता-फूलता गया। बड़े-बड़े विद्वान, कलाकार-वैज्ञानिक, उद्योगपति, व्यवसायी, ग़रीब, अमीर हज़रत मुहम्मद साहब (सल्ल.) व पवित्र धार्मिक ग्रन्थ क़ुरआन की शिक्षाओं के बारे में भली-भाँति परिचित होते चले गये। 
    कुछ यथास्थितिवादी कट्टरपंथी मनीड्ढियों, स्वामी, महात्माओं ने इस्लाम के पवित्र धार्मिक ग्रन्थ क़ुरआन को लेकर उनकी शिक्षाओं को तोड़-मरोड़ कर तथा अशोभनीय आलोचना लिखकर जन-समूह को गुमराह, भ्रमित करने का दुस्साहस कर कुप्रयास किया है। प्रस्तुत पुस्तक ‘‘स्वामी दयानन्द जी ने क्या खोजा, क्या पाया?’’ में उन आपत्तियों तथा तथ्यों का विश्लेषण करते हुए जन-समूह के मन-मस्तिष्क में व्याप्त आशंकाओं व दुविधाओं को दूर करने का सफल प्रयत्न किया गया है।
    आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने सामाजिक एवं धार्मिक ग्रन्थ ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के अधिकांशः समुल्लास में इस्लाम धर्म, क़ुरआन, जैन धर्म, बुद्ध धर्म एवं ईसाई धर्म के प्रति चुनौतीपूर्ण शब्दों में अशोभनीय कटाक्ष किया है, जो कि वास्तव में ही निन्दनीय प्रतीत होता है। विद्वान लेखक डा. अनवर जमाल ने प्रस्तुत पुस्तक में बहुत ही सारगर्भित रूप से स्पष्टीकरण कर अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है, जो कि सराहनीय है और लेखक बधाई के पात्र हैं।
    यहां पाठक बंधुओं को स्मरण कराना चाहूंगा कि भारत वर्ष  में जाति-व्यवस्था एक ऐसी इमारत है, जिसमें सीढ़ियाँ नहीं हैं और जो जहाँ है वह सदैव वहीं रहने को बाध्य है। आखि़र ऐसा क्यों? यह प्रश्न मुझे ही नहीं अपितु प्रत्येक बुद्धिजीवी को निशदिन कचोटता रहता है? आर्यों द्वारा थोपी गई जाति आधारित असमानतावादी सामाजिक कुव्यवस्था का स्वामी दयानन्द ने खण्डन क्यों नहीं किया, आश्चर्य होता है?
    प्रस्तुत पुस्तक के लेखक डा. अनवर जमाल जी ने इस आधुनिक युग में स्वामी जी की पुस्तक सत्यार्थ-प्रकाश में उल्लिखित हिन्दू धर्म से अन्यत्र धर्मों की टीका टिप्पणी और आलोचनाओं पर एक प्रभावशाली ज़ोरदार प्रहार कर शिक्षित और राष्ट्रीय हित के विचारवान लोगों को यह चिन्तन-मनन करने के लिए विवश कर दिया है कि स्वामी जी ने देश-हित और जनहित में खोजा एवं पाया बहुत कम था। मात्र इसके कि उन्होंने कट्टरता को ही पनपाया।
    सम्मानित लेखक डा. अनवर जमाल साहब का यह प्रयास बहुत ही सराहनीय व प्रशंसापूर्ण कार्य साहित्य क्षेत्र में सर्वदा मील का पत्थर माना जायेगा। वे इस शुभ कार्य के लिए बधाई के सुयोग्य पात्र हैं तथा सम्पादक मण्डल के सभी सदस्यों को बधाई देना चाहूंगा, जिनके अथक प्रयास से यह पुस्तक प्रकाशित हुई है। मुझे उन से आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी जनहित में दक़ियानूसी लेखकों पर अपनी टिप्पणी का प्रहार कर सर्वसमाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे। मैं उनकी इस पुस्तक के लिए हृदय से आभार प्रकट करता हूँ।
    भवतु सब्ब मंगलम्।

19.02.2014                                  

आपका शुभाकांक्षी 
हीरालाल कर्दम वरिष्ठ साहित्यकार                              
189, श्रद्धांजलि भवन, कोठी गेट 
जनपद हापुड़ (उ. प्र.)
मोबाईल नं. 9997487981

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भूमिका
      इन्सान का रास्ता नेकी और भलाई का रास्ता है। यह रास्ता सिर्फ उन्हें नसीब होता है जो धर्म और दर्शन (Philosophy) में अन्तर जानने की बुद्धि रखते हैं। धर्म ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है जो मूलतः न बदलता है और न ही कभी बदला जा सकता है, अलबत्ता धर्म से हटने वाला अपने विनाश को न्यौता दे बैठता है और जब यह हटना व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो तो फिर विनाश की व्यापकता भी बढ़ जाती है।
    दर्शन इन्सानी दिमाग़ की उपज होते हैं। ये समय के साथ बनते और बदलते रहते हैं। धर्म सत्य होता है जबकि दर्शन इन्सान की कल्पना पर आधारित होते हैं। जैसे सत्य का विकल्प कल्पना नहीं होती है। ऐसे ही धर्म की जगह दर्शन काम नहीं दे सकता। दर्शन में सही और लाभदायक शिक्षाएं होती हैं लेकिन इनसे लाभ लेने के लिए भी धर्म का ज्ञान अनिवार्य है। 
धर्म को भुलाकर दर्शन के अनुसार जीना ग़लत ढंग से जीना है, जिसका अंजाम तबाही की शक्ल में सामने आता है। इसीलिए हज़ारों वर्ष पहले हमारे समाज में बहुदेववाद, जातिवाद और अन्याय पनपा, युद्ध हुए। एक आर्यावर्त में हज़ारों देश बने। विदेशी आक्रमण से ज़्यादा देशी आक्रमण हुए। परायों से ज़्यादा अपनों का ख़ून, अपनों के हाथों बहता रहा। विद्वान बताते हैं कि अकेले महाभारत के युद्ध में ही 1 अरब 66 करोड़ मनुष्य मारे गए। हज़ारों युद्ध और भी हुए, लाखों तबाहियाँ हुईं और आखि़रकार भारतीय विदेशियों के ग़ुलाम बन गए। वे आज भी क़र्ज़दार हैं। भारत को तीसरी दुनिया के देशों में गिना जाता है। इस तरह धर्म वाला विश्वगुरू भारत दर्शनों पर चलकर बर्बाद हो गया।
    भारत एक धर्म प्रधान देश था लेकिन बाद में दार्शनिकों ने इसे दर्शन प्रधान बना दिया। आज हर तरफ़ दर्शनों का बोलबाला है। दर्शनों की भीड़ में धर्म कहीं खो गया है। आज वैदिक धर्म में अग्नि का बड़ा महत्व है। अग्नि के बिना यज्ञ-हवन नहीं हो सकता। वैदिक धर्म के 16 संस्कारों में से कोई एक भी बिना अग्नि के संपन्न नहीं हो सकता। जबकि अग्नि की खोज से पहले मनुष्य परमेश्वर की उपासना और अंतिम संस्कार आदि अग्नि के बिना ही करता था। 
    अग्नि की खोज के बाद धर्म के रूप को बदल दिया गया। पहले जिस धर्म में उपासना के लिए ध्यान और नमन था, उसमें अब हवन भी शुरू कर दिया। इस तरह धर्म से हटने और दर्शन पर चलने की शुरूआत हुई। इन्हें लिखा गया तो वर्तमान वेद, उपनिषद व दर्शन आदि बन गए। समय के साथ यज्ञ के रीति रिवाज जटिल हो गए। राजकोष जनकल्याण के कामों पर ख़र्च होने के बजाय महीनों चलने वाले महंगे यज्ञों में स्वाहा होने लगा। तब बौद्ध, जैन और चार्वाक आदि ने जनता के विरोध को स्वर दिया। उनकी बातों में भी दर्शन था। यज्ञ करने वाले और उनका विरोध करने वाले, दोनों ही दर्शन की बातें कर रहे थे। धर्म कहीं पीछे छूट चुका था।
    ये अनेकों दर्शन धर्म की जगह लेते चले गए। इसी से विकार जन्मे। सुधारकों ने उन्हें सुधारने का प्रयास भी किया। लाखों गुरूओं के हज़ारों साल के प्रयास के बावजूद यह भारत भूमि आज तक जुर्म, पाप और अन्याय से पवित्र न हो सकी। कारण, प्रत्येक सुधारक ने पिछले दर्शन की जगह अपने दर्शन को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया, धर्म को नहीं। उन्हें पता ही न था कि दर्शनों की रचना से पूर्व धर्म का स्वरूप क्या था ?
    स्वामी दयानन्द जी भी एक ऐसे ही दार्शनिक थे। धर्म को न जानने के कारण उन्होंने सुबह शाम अग्निहोत्र (हवन) करना हरेक मनुष्य का कर्तव्य निश्चित कर दिया और न करने वाले को सत्यार्थप्रकाश, चौथे समुल्लास (पृष्ठ 65) में शूद्र घोषित कर दिया। आर्य समाज मंदिरों में भी दोनों समय हवन नहीं होता। आर्य समाज के सदस्य और पदाधिकारी तक दोनों समय हवन नहीं करते, कर भी नहीं सकते। सुबह शाम हवन, वह आर्य समाजियों से अपने सामने भी न करा पाए।
    नतीजा यह हुआ कि जो लोग उनके पास आर्य बनने के लिए आते थे, वे हवन न करने के कारण शूद्र अर्थात मूर्ख बनते रहे। स्वामी दयानंद जी के अनुसार सनातनी पंडित लोगों को मूर्ख बना रहे थे और उनका विरोध करने वाले स्वामी जी ख़ुद भी आजीवन यही करते रहे। उनके बाद भी यह सिलसिला जारी है। उनकी घोर असफलता का कारण केवल यह था कि उन्हें दर्शन का ज्ञान था, धर्म का नहीं। 
    धर्म में ध्यान और नमन है, हवन नहीं। अग्नि की खोज से पहले भी धर्म यही था और आज भी धर्म यही है। सनातन काल से मनुष्य का धर्म यही है। इसलाम इसी सनातन धर्म की शिक्षा देता है। इसलाम का विरोध वही करता है, जिसे धर्म के आदि सनातन स्वरूप का ज्ञान नहीं है। ऐसे ही दार्शनिकों के कारण बहुत से मत बने और अधिकतर मनुष्य धर्म से हटकर विनाश को प्राप्त हुए।
    जिस भूमि के अन्न-जल से हमारी परवरिश हुई और जिस समाज ने हम पर उपकार किया, उसका हित चाहना हमारा पहला कर्तव्य है। मानवता को महाविनाश से बचाने के उद्देश्य से ही यह पुस्तक लिखी गई है। जगह-जगह मिलने वाले दयानन्दी बंधुओं के बर्ताव ने भी इस पुस्तक की ज़रूरत का अहसास दिलाया और स्वयं स्वामी जी का आग्रह भी था-
    ‘इस को देख दिखला के मेरे श्रम को सफल करें। और इसी प्रकार पक्षपात न करके सत्यार्थ का प्रकाश करके मुझे वा सब महाशयों का मुख्य कर्तव्य काम है।’ (भूमिका, सत्यार्थप्रकाश, पृष्‍ठ 5, 30वाँ संस्करण)
    सो हमने अपना कर्तव्य पूरा किया। अब ज़िम्मेदारी आप की है। आपका फै़सला बहुत अहम है। अपना शुभ-अशुभ अब स्वयं आपके हाथ है। स्वामी जी के शब्दों में हम यह विनम्र निवेदन करना चाहेंगे कि
‘यह लेख हठ, दुराग्रह, ईष्र्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिए किया गया है न कि इनको बढ़ाने के अर्थ। क्योंकि एक दूसरे की हानि करने से पृथक् रह परस्पर को लाभ पहुँचाना हमारा मुख्य कर्म है।’ (सत्यार्थप्रकाश, अनुभूमिका 4, पृ.360)
    ‘इस मेरे कर्म से यदि उपकार न मानें तो विरोध भी न करें। क्योंकि मेरा तात्पर्य किसी की हानि या विरोध करने में नहीं किन्तु सत्याऽसत्य का निर्णय करने कराने का है।’ (सत्यार्थप्रकाश, अनुभूमिका, पृ.186)

विनीत, 
डा. अनवर जमाल               
दिनांक - बुद्धवार, 29 जुलाई 2009
श्रावण, अष्टमी द्वितीया, सं. 2066 
द्वितीय, दिनांकः रविवार, 15 सितम्बर 2013 
9 ज़ी-क़ाअदा 1434 हिजरी

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¤ क्या से क्या हो गया?
     वास्तव में परम प्रशंसा, स्तुति और वन्दना उस परमेश्वर के लिए है जो अपनी पैदा की हुई सारी चीज़ों का पालनहार है और उन्हें पूर्णता तक पहुंचाने में सक्षम है। वह एक है। सबका मालिक वही एक है। सब चीज़ें उसी के नियमों के अधीन हैं। यह परम सत्य है। आदिकाल से इस एक सत्य को विद्वानों ने बहुत से अलंकारों से सुशोभित करते हुए कहा है। 
      जब युग बदले, भाषा बदली  और विद्वान भी बदल गए। राजा बदले, प्रजा बदली और उनके देश भी बदल गए। सोच बदली और परम्पराएं भी बदल गईं। तब जो रूपक अलंकार थे, उन्हें कथा समझ लिया गया। अर्थ का अनर्थ हो गया। अधर्म के काम धर्म समझ लिए गए। राजा, प्रजा, और प्रकृति सबकी स्तुति होने लगी। सबको देवता समझ लिया गया। बाद के लोगों ने पुराना काव्य नये काव्य के साथ संकलित कर दिया तो देव की स्तुति के साथ देवताओं की स्तुति भी मिश्रित हो गई। नासमझी से उत्पन्न बहुदेववाद को चतुर लोगों ने मूर्तिपूजा का रूप देकर अपनी रोज़ी का जुगाड़ कर लिया। इस तरह धर्म का लोप हुआ और उसकी जगह अधर्म को दे दी गई। समाज के नीति-नियम यही अधर्मी बनाने लगे। इन्हीं अधर्मियों के कारण अत्याचार और युद्ध हुए और मानव जाति बर्बाद हो गई। दोष दिया गया निर्दोष धर्म को। विचारकों के मन को सवालों ने बेचैन किया तो धर्म का लोप करने वालों ने अध्यात्म से उन्हें भी शांत कर दिया। वे कहने लगे कि मन को विचारशून्य बना लो, परम शांति मिल जाएगी। तर्क त्याग दो, श्रद्धा उपलब्ध हो जाएगी।

¤ स्वामी दयानन्द जी का जन्म स्थान अज्ञात है
     भारतीय समाज के हालात ऐसे थे, जब स्वामी दयानन्द जी ने जन्म लिया। स्वामी जी ने स्वकथित जीवनचरित्र में संवत् 1881 विक्रमी में गुजरात के मोरवी नगर में औदीच्य ब्राह्यण परिवार में अपना जन्म होना बताया है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की पुस्तक ‘आर्यपथिक लेखराम’ पृष्ठ 80 से ज्ञात होता है कि लेखराम जैसे श्रद्धालुओं ने सन 1892 ई. में मोरवी नगर के साथ टंकारा में भी स्वयं जाकर ढूंढा लेकिन वे उनका कुल तो क्या, जन्मस्थान तक न ढूंढ पाए। उन्होंने किस जाति में और कहां जन्म लिया?, इसे कोई नहीं जानता। वास्तव में उनका जन्म स्थान आज तक अज्ञात है। 


नोट प्रकाशित पुस्‍तक में भी Lekharam पर लिखी पुस्‍तक के उस पृष्‍ठ को स्‍केन करके साथ में दिया गया है

--Link:-Unicode Book Part: Two------- -three------ and---Last

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