सच्चे गुरु की खोजः वर्तमान समाज की ज़िम्मेदारी
स्वामी जी के दर्शन और उनके जीवन को देखने के बाद एक ऐसे आदमी की तस्वीर सामने आती है जो कि अपने मिशन में पूरी तरह असफल रहा। अपने अज्ञान और हठ के कारण वह विधवाओं, शूद्रों और मुसलमानों को उनके मानवोचित अधिकारों से वंचित करते रहे। इसे समाज सुधार नहीं कहा जा सकता। जो उन्हें अपना गुरू मानते हैं, वे भी उनके मार्ग पर चलने में, वैदिक संस्कारों का पालन करने में असफल रहे। एक गुरू की ज़रूरत मानव मात्र को हमेशा से रही है और आज भी है।
वह कौन है? आर्य बन्धुओं के लिए यह खोज का विषय है क्योंकि यह प्रमाणित हो चुका है कि स्वामी दयानन्द जी को अपनी खोज में कोई सच्चा गुरु न मिला और वह स्वयं भी इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर पाए। उनके जीवन के कटु अनुभवों और वेदार्थ को समझ पाने में उनकी और उनसे पूर्व के भाष्यकारों की नाकामी से पता चलता है कि वैदिक आर्य जाति काफ़ी समय से वास्तविक और पूर्ण ज्ञानी गुरू से रिक्त है। यह दुखद है, लेकिन सच यही है।
इसके बावजूद हमें यक़ीन है कि सम्पूर्ण भारत जल्द ही अपना खोया हुआ धर्म, सत्य और गौरव प्राप्त कर लेगा क्योंकि भारतवासी स्वभाव से ही ज्ञानाकांक्षी हैं। ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में अब जाति, भाषा और राष्ट्र की बेबुनियाद दीवारें भी ढहती जा रही हैं। मशहूर चीनी कहावत है कि
‘जब विद्यार्थी तैयार हो जाता है तो गुरू उपस्थित हो जाता है।’
¤ जो ढूंढता है वह पाता है लेकिन ...
गुरू की खोज का अभियान जारी रखिये क्योंकि जो ढूंढता है वही पाता है। उन जगहों पर भी तलाश कीजिए जहाँ अभी तक तलाश न किया हो। हो सकता है कि सच्चा गुरू उस रूप में और उस परिधि में मिले जिसकी कल्पना भी न की हो। सच्चा गुरू उस वेश-वंश, देश और भाषा में मिले जिसे स्वीकारना निजी अहंकार और गर्व पर चोट करता हो। बहरहाल कल्याण के लिए सच्चा गुरू अनिवार्य है। अब वह जैसे भी मिले और जहाँ भी मिले।
‘धर्म को साक्षात करना और सब विद्याओं का यथावत जानना’ उसका मूल लक्षण है। आप उसे इस लक्षण से पहचान जाएंगे। ऐसे ही ‘आप्त पुरूड्ढ’ के उपदेश को मानने के लिए स्वयं स्वामी दयानन्द जी भी कह गए हैं-
‘जो पृथिवि से लेके परमेश्वर पर्यन्त सब पदार्थों को यथावत् साक्षात् करना और उसी के अनुसार वत्र्तना है इसी का नाम आप्ति है, इस आप्ति से जो युक्त हो उसको ‘आप्त’ कहते हैं। उसी के उपदेश का प्रमाण होता है, इससे विपरीत मनुष्य का नहीं.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोत्पत्ति., पृ.14)
देखिये, जानिये, सोचिये, समझिये और फिर फैसला कीजिए क्योंकि आपके फैसले से ही आपका भविष्य निर्धारित होता है। आपके विचार से ही आपके कर्म फूटते हैं और अपने कर्मों का फल भी आपको स्वयं ही भोगना है। आप सत्य की खोज और स्वीकार के मार्ग पर आगे बढ़कर अपना जीवन स्वर्ग बनाना चाहते हैं, मुक्ति, आनंद और ईश्वर पाना चाहते हैं या फिर घृणा, तिरस्कार और अपने अंहकार की ऊंची दीवार से ही सिर टकराते रहना चाहते हैं?
पानी वहीं मिलेगा जहाँ कि वास्तव में वह मौजूद है। ‘मृगमरीचिका’ से किसी को आज तक पानी नसीब नहीं हुआ तो आपको कैसे मिल जाएगा?
¤ ढूंढिये, लेकिन वहाँ, जहाँ कि वह सचमुच है
(107) ‘...सत्य असत्य के ग्रहण व त्याग करने में सदा उद्यत रहने वाले आर्य क्या दूसरों को ही उपदेश देते रहेंगे? क्या वे स्वयं सत्य पक्ष को ग्रहण करने में हठवश संकोच ही करते रहेंगे ?’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पृष्ठ 7)
(108) ‘‘क्या ऐसे व्यक्ति वेद की ‘असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः’ इस व्यवस्था से बच सकेंगे?’’ (सत्यार्थप्रकाश, प्रकाशकीय पृष्ठ)
¤ वैदिक विज्ञान से सत्य ढूंढना सीखिए
‘मनुष्य का आत्मा सत्याऽसत्य का जानने वाला है’ (सत्यार्थप्रकाश, भूमिका, पृष्ठ 2)
‘‘यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यत।। यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है।
जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी से बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। (सत्यार्थप्रकाश, प्रथमसमुल्लास पृष्ठ 13)
यह सत्य है। आधुनिक विज्ञान ने चेतन और अवचेतन मन पर शोध करके बताया है कि यदि आप शंका और दुविधा के कारण कोई फ़ैसला नहीं कर पा रहे हैं तो आप सही फ़ैसले पर पहुंचने का संकल्प करके उस मामले को अपने अवचेतन मन के हवाले कर दीजिए। आप सही फ़ैसले पर पहुंच जाएंगे। अवचेतन मन से सोने से ठीक पहले और सुबह को जागने के ठीक बाद सबसे अच्छी तरह काम लिया जा सकता है।
आप रात को सोते समय अपने ्यरीर के सभी अंगों को शिथिल कर लीजिए। अब सत्य पाने की सच्ची कामना के साथ, अधिकारपूर्वक बार-बार दोहराएं कि
‘मेरी आत्मा सत्य को जानती है। मैं निष्पक्ष हूँ और सत्य-मार्ग पर चलता हूँ।’
आप इस की एक माला भी जप सकते हैं यानि 108 बार। फिर आप धीरे धीरे प्रेमपूर्वक ‘सत्य, सत्य, सत्य’ कहते हुए नींद में चले जाएं। इस क्रिया को नित्य कीजिए। आपका अवचेतन मन इस पर प्रतिक्रिया करेगा और वह आपके जीवन में सत्य के मार्ग पर जाने की परिस्थितियाँ प्रकट कर देगा। जब आपका चेतन मन सो जाता है, तब भी आपका अवचेतन मन जागता रहता है। यह सृष्टि नियम है। यह महान वैदिक विज्ञान है। आप इस वैदिक रीति से सत्य का सीधा मार्ग आसानी से पा सकते हैं।
सत्य को अरबी में ‘हक़’ कहते हैं। हक़ अल्लाह का एक नाम भी है। वैदिक बन्धु भी सत्य को ईश्वर का एक नाम मानते हैं। यह बिन्दु दोनों को एक कर देता है। इल्मुल आदाद के अनुसार हक़ शब्द के अदद 108 हैं और हिन्दुओं की माला में भी 108 दाने होते हैं। ‘हक़’ नाम के जाप से मुस्लिम सूफ़ी बड़े बड़े काम लेते हैं। जिन्हें अल्लाह के नाम और उनका अर्थ बताने वाली किताबों में देखा जा सकता है।
सत्य और रहस्य आपके सामने प्रकट हो चुका है। अब करना आपको है और पाना भी आपको ही है।
-- --Book Download Link-Midiafire.com-
http://www.mediafire.com/download/ydp77xzqb10chyd/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya-paya-second-edition.pdf --
डा. अनवर जमाल की पुस्तक "'स्वामी दयानंद जी ने क्या खोजा? क्या पाया?" परिवर्धित संस्करण PDF इधर से भी डाउनलोड की जा सकती है --पुस्तक में108 प्रश्न नंबर ब्रेकिट में दिये गए हैं
https://archive.org/stream/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya-paya-published-book/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya-paya-second-edition#page/n0/mode/2up
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पुस्तक युनिकोड में चार पार्ट में इधर भी है
http://108sawal.blogspot.in/2015/04/swami-dayanand-ne-kiya-khoja-kiya-paya.htm
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