Tuesday, 30 August 2016

Laxmi sankracharye

सत्य सामने आने के बाद मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ कि मैं अनजाने में भ्रमित था और इसी कारण ही मैंने अपनी किताब 'इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास ' में आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा है जिसका मुझे हार्दिक खेद है ।  [लक्ष्मिशंकाराचार्य]    

स्वामी लक्ष्मिशंकाराचार्य जी की पुस्‍तक ''इस्लाम आतंक ? या आदर्श'' 24 Quran ki aayton ka apne sawaal ka khud unka hi jawab idhar se padhen
http://siratalmustaqueem.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html

Arya samaj ki maut

arya samaj ki maut के लेखक साबित करते हैं कि आर्यसमाज मुसलमानों के सिद्धांत वेदों में लाया, वेदों में पृथवी कैसे घूमने लगी पुस्तक के पृष्ठ 272-273 के स्केन चित्र में पढें , बहतर क्वालिटी के लिए किताब डाउनलोड करके पढें

दयानंद जी के जाली वेद मंत्र पृष्ठ 141 से शुरू होकर  बनावटी वेद मंत्र, अनोखे  वेद मंत्र, नकली वेद मंत्र , झूटे मंत्र , फर्जी मंत्र , कल्पित मंत्र पृष्ठ146 पर पढें,

विलुप्त हो हो चुकी लगभग 400 पृष्ठों की किताब पर आजकल सरसरी नजर डाल रहा हूं आप भी पढना चाहें तो इधर है
Download "arya samaj ki maut" पंडित कालूराम शास्त्री
https://archive.org/details/arya_samaj_ki_maut
इधर भी है
http://www.mediafire.com/d…/hw68l6dtbh38pfh/hudoos-e-ved.pdf
धन्यवाद

आर्य समाज मंदिर दिल्ली 13,000 में शादी

नाबालिग को बालिग बनाते हैं आर्य समाज के दलाल,चंद रुपयों में नाबालिग को बालिग साबित करवाने के दस्तावेज और उन दस्तावेजों के आधार पर नाबालिग लड़की की शादी। दिल्ली के आर्य समाज मंदिरों में नाबालिग लड़कियों की शादी की जा रही है, ऐसी कई शिकायतें ज़ी मीडिया ग्रुप की क्राइम एंड इनवेस्टिगेशन सेल को मिलीं, जिसके बाद सच्चाई जानने के लिए हमारी टीम ने दिल्ली के 3 आर्य समाज मंदिरों में इनवेस्टिगेशन शुरू की। सच जानने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।
नाबालिग लड़कियों की शादियां करवाने का दावा करने वाले पी.एन. शास्त्री से क्राइम फाइल्स की टीम मिली। दिल्ली के कड़कड़डूमा मेट्रो स्टेशन के पास बने आर्य समाज मंदिर का संचालन करते हैं पी.एन. शास्त्री। पी.एन. शास्त्री ने शुरुआत में तो नाबालिग लड़की की शादी करवाने से इंकार किया लेकिन थोड़ी बातचीत के बाद उन्होंने इसके तरीके बताने शुरू कर दिए।
अंडरकवर एजेंट- लड़की नाबालिग है, शादी करवानी है?
शास्त्री– हो जाएगी, रजिस्ट्रेशन वगैरह का खर्चा होगा। करीब 5000 रुपये और ऊपर मेडिकल लगा तो और।
अंडरकवर एजेंट- मेडिकल का कितना?
शास्त्री– 3000 रुपये। आप टोटल 13 हजार रुपये का खर्चा मान के चलो पूरी शादी का।
आर्य समाज मंदिर के.पी. एन शास्त्री ने ये भी कुबूल किया कि अगर मेडिकल सर्टिफिकेट में लड़की की उम्र कम भी आती है तो मेडिकल सर्टिफिकेट को पैसे के दम पर बदलावाया भी जा सकता है और इस पूरे काम में डॉक्टर भी शामिल होंगे। साथ ही साथ ये भरोसा भी दिलाया गया कि उनकी कराई गई शादी का सर्टिफिकेट कानूनी तौर पर मान्य होगा।
अंडरकवर एजेंट- शादी का सर्टिफिकेट कैसा होगा ?
शास्त्री- लीगली मान्य होगा मंदिर या कोर्ट में मिलेगा।
अंडरकवर एजेंट- तो शादी कहां होगी और रजिस्टर कैसे होगी ?
शास्त्री- कश्मीरी गेट आईएसबीटी बस अड्डे के पास यहां शादी करवाएंगे और सीधे गाजियाबाद ले जाकर रजिस्टर करवा देंगे।
लेकिन हमारे लिए सिर्फ एक आर्य समाज मंदिर में बात करना ही काफी नहीं था। ज्यादातर आर्य समाज मंदिरों में ऐसे ‘शादीलाल’ मौजूद हैं जो चंद रुपयों के लिए कानून को ताक पर रख नाबालिग लड़कियों की शादी करवाने का धंधा करते हैं।
इसी सिलसिले में क्राइम फाइल्स की टीम ने दिल्ली के नवीकरीम आर्य समाज मंदिर में ऋषि पाल शास्त्री से मुलाकात की तो एक और हैरान कर देने वाली कहानी सामने आई।
रिपोर्टर- लड़का-लड़की तैयार हैं लेकिन लड़की बालिग नहीं है कैसे होगा?
शास्त्री- करवा देंगे। एफिडेविट बनवा देंगे एसडीएम से। आप पिता का नाम, एड्रेस वगैरह दे दो मैं कल बनवा देता हूं फिर 6 महीने तक जब चाहो शादी करा लो। और 2000 रुपए लगेंगे।
हम इतना तो जान चुके थे कि ये सब करवाना इनके बाएं हाथ का खेल है लेकिन हमारे लिए सिर्फ इतना ही काफी नहीं था लिहाजा हमारी कोशिश थी कि वो कुछ और खुलासे भी करें। इसी मकसद से हमने बातचीत जारी रखी।
अंडरकवर एजेंट- सब कानूनी होना चाहिए।
शास्त्री– हमारे पास एसडीएम को उम्र बताने का रिकॉर्ड होगा। वो वैध होता है।
अंडरकवर एजेंट- लेकिन लड़की की उम्र तो कम है?
शास्त्री- अरे अगर 18 का वैध प्रमाणपत्र मिल जाता है तो कोर्ट भी , सुप्रीम कोर्ट भी हमारे मैरिज सर्टिफिकेट को मानता है।
रिषी पाल शास्त्री का दावा सुनकर हम भी हैरान थे। आखिर क्या वजह है कि नाबालिग लड़की की शादी करवाने के लिए जिन दस्तावेज़ों को बनवाने की ये शख्स बात कर रहा है, उनमें ऐसा क्या खास है कि उसे सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती। और बातचीत की तो पता चला कि वो किसी साधारण शख्स से नहीं बल्कि मेजिस्ट्रेट से उम्र का सर्टिफिकेट बनवाने की बात कह रहा है।
अंडरकवर एजेंट- मगर उसकी उम्र कम है।
शास्त्री- जो हमने लिख दिया, वो माना जाएगा क्योंकि हम मेजिस्ट्रेट से लिखवा रहे हैं ।
अंडरकवर एजेंट-वो सर्टिफिकेट फेक होगा तो कोई प्रोब्लम तो नहीं होगी ?
शास्त्री- आप निश्चिन्त रहो, मुझपर भरोसा करो, मैं रोज शादियां करवाता हूं।
हमारी तफ्तीश अब भी जारी थी। इस बार हमें एक ऐसे दलाल के बारे में पता चला जो नाबालिग लड़कियों को बालिग बनाने के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल करता था। इन अवैध कागजातों की पड़ताल के लिए हम दिल्ली के यमुना बाजार इलाके में पहुंचे। यहां मौजूद आर्यसमाज मंदिर के ट्रेजरार शिव कुमार शास्त्री ने हमें बताया कि वो सिर्फ आधार कार्ड की स्लिप पर शादी करवा सकता है। इस दलाल ने हमें एक डॉक्टर से भी मिलवाया जिसने पहली बार में लड़की की उम्र 17 साल लिख दी, लेकिन तीन दिन बाद उसी डॉक्टरने हमें खुद एक और सर्टिफिकेट दिया जिसमें लड़की की उम्र 18 साल थी।
हमारी तहकीकात का मकसद लगभग पूरा हो गया था। खुफिया कैमरे में तीनों दलालों की सारी बातचीत कैद हो गई थी। डॉक्टर का बनाया फर्जी एज सर्टिफिकेट भी हमारे हाथ में था और इसी के साथ बेनकाब हो गए थे आर्य समाज मंदिरों के ‘शादीलाल’।
कानून का मजाक बना रहे हैं आर्य समाज मंदिर के दलाल। आर्य समाज मंदिर की स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने की थी और कानून में भी आर्य समाज मंदिर में हुई शादियों को वैध माना जाता है। लेकिन वक्त बीतने के साथ-साथ अब आर्य समाज मंदिरों में शादी करवाने वाले दलालों ने अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। ये ऐसे लोग हैं जो चंद रुपयों के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, फिर चाहे क्यों न नाबालिग लड़की की शादी करवाने का पाप ही क्यों न हो।
आर्य समाज मंदिरों में हुई शादियों का सच क्राइम फाइल्स की टीम ने तफ्तीश की तो पाया की हरियाणा, दिल्ली, यूपी और पंजाब में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां किसी युवक ने पहले नाबालिग लड़की को भगाकर उससे दिल्ली के आर्य समाज मंदिरों में शादी कर ली, लेकिन बाद में जब स्थानीय पुलिस ने मामले की तफ्तीश की तो लड़की की शादी के दस्तावेज़ों को अवैध माना गया। 14 अगस्त को ऐसे ही एक मामले में हरियाणा के भिवानी की अदालत ने एक युवक को सजा सुनाई है।

आर्य समाज की भंडाफोड़ किताबे

#आर्य_समाज_का_भाण्डा_फोड़ती_हुई_पुस्तको_की_लिस्ट

भंगेड़ी दयानंद के खंडन में रचित साहित्य - 

१- अबोध निवारण (Y) 

२- दयानंद की विद्वता (Y) 

३- दयानंद के यजुर्वेद भाष्य की समीक्षा (Y)

४- दयानंद के मूल सिद्धांत की हानि (Y)

५- दयानंद मत दर्पण (Y)

६- दयानंद का कच्चा चिट्ठा (Y)

७-  दयानन्द भास्कराभास निवारण  (Y) 

८- दयानंद लीला  (Y) 

९-   दयानंद तिमिर भास्कर (Y)

१०-  दयानंद की बुद्धि (Y) 

११-  दयानंद विरचित झूठे वेदमन्त्र  (Y) 

१२ - सत्यार्थप्रकालोचनम्  (Y)

१३ -   आर्यसमाज की मौत  (Y) 

१४ -   वैदिक धर्म सत्यार्थ प्रकाश (Y) 

१५-  काशी शास्त्रार्थ का सत्य  (Y) 

१६ -   शास्त्रार्थ राज धनवार  (Y) 

१७ -  ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम् (Y) 

१८-   वेदार्थ पारिजात  (Y)

१९-     पारिजात वार्त्तिक    (Y)

२०-  दयानंदपराभूति   (Y)

२१ -  दुर्जनमुखमर्दन   (Y)

Monday, 29 August 2016

Arye

आर्य समाज हमेशा भाषा पर संयम रखे बिना सवाल में सवाल करता रहा है अब 1 नहीं उसको  108 जवाब देने हैं, मित्रों की आपसी बातचीत से पता चलता है कि प्रस्‍तुत पुस्‍तक का पहला एडिशन बहुत कामयाब रहा था उसकी सफलता पर एक अलग आर्टिकल लिखा जा सकता है, यह प्राविर्धत संस्‍करण है जिसमें कल और आजकल के समय की आवश्‍यकताओं का खयाल रखते हुए, आर्य समाज की किताबों से ही ली गयी बातों की समीक्षा करते हुए उन पर एक सौ आठ प्रश्‍न किए गए हैं, विषय सूची पर नजर डालेंगे तो समझ लेंगे कि प्रस्‍तुत पुस्‍तक में आर्य समाज के संबन्‍ध में छपी सभी पिछली किताबों से बहुत कुछ अलग हट के है http://islaminhindi.blogspot.in/2015/04/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya.html

Sunday, 28 August 2016

Arya Samaj - ख़तना और पेशाब

सत्यार्थ प्रकाश’ के रचयिता ने लिखा है कि अगर ख़तना कराना ईश्वर को इष्ट होता तो वह ईश्वर उस चमड़े को आदि सृष्टि में बनाता ही क्यों ? और जो बनाया है वह रक्षार्थ है जैसा आँख के ऊपर चमड़ा। वह गुप्त स्थान अति कोमल है जो उस पर चमड़ा न हो तो एक चींटी के काटने और थोड़ी चोट लगने से बहुत सा दुःख होवे और लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों में न लगे आदि बातों के लिए ख़तना करना बुरा है। ईसा की गवाही मिथ्या है, इसका सोच-विचार ईसाई कुछ भी नहीं करते। (13-31)

‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक का यह कहना कि अगर ख़तना कराना ईश्वर को पसंद होता तो वह चमड़ा ऊपर लगाता ही क्यों? यह कोई बौद्धिक तर्क नहीं है? सृष्टिकर्ता ने मनुष्य को नंगा पैदा किया है, इसका मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि मनुष्य कपड़े ना पहने, नंगा ही जिये, नंगा ही मरे, गंदा पैदा होता है, गंदा ही रहे। नाखून और बाल आदि भी न कटवाए। दूसरी बात यह कि सृष्टिकर्ता ने चींटी व चोट आदि से सुरक्षा हेतु झिल्ली की व्यवस्था की है। जिस चमड़ी की व्यवस्था सृष्टिकर्ता ने की है वह चमड़ी या झिल्ली न चींटीं रोधक है और न ही चोट रोधक। वह झिल्ली स्वयं इतनी अधिक कोमल है कि उसे खुद सुरक्षा की आवश्यकता है। तीसरी बात कि लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रांश कपड़ों पर न लगे इसलिए झिल्ली की व्यवस्था की गई है। झिल्ली में कोई सोखता तो लगा नहीं कि वह मूत्रांश को अपने अंदर सोख लेगा। झिल्ली होने से तो और अधिक मूत्रांश झिल्ली में रूकेगा और कपड़ों को गीला और गंदा करेगा। यह तो एक साधारण सी बात है इसमें किसी शोध की भी आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक पेशाब की बात है पेशाब शरीर की गंदगी है, इसे धोया जाए तो नुकसान ही क्या है? मगर लेखक ने पेशाब धोने की बात कहीं नहीं लिखी है, जबकि हिंदू ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। एक उदाहरण देखिए -

एका लिंगे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश ।

उभयोः सप्त दातव्याः मृदः शुद्धिमभीप्सता ।।

(मनु, 5-139)

भावार्थ - शुद्धि के इच्छुक व्यक्ति को मूत्र करने के उपरांत लिंग पर एक बार जल डालना चाहिए । मलत्याग के उपरांत गुदा पर तीन बार मिट्टी मलकर दस बार जल डालना चाहिए और जिस बायें हाथ से गुदा पर मिट्टी मली है व जल से उसे धोया है, उस पर दस बार जल डालते हुए दोनों हाथों पर सात बार मिट्टी मलकर उन्हें जल से अच्छी प्रकार धोना चाहिए ।

यहाँ यह भी विचारणीय है कि लेखक ने अपनी समीक्षा में केवल ईसा मसीह और ईसाइयों का ही उल्लेख किया है जबकि ख़तना तो यहूदी और मुसलमान भी कराते हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने शोध कर दावा किया है कि ख़तना कराने वाले लोगों में एच.आई.वी. संक्रमण होने के आसार अन्य लोगों की तुलना में छः गुना कम होते हैं। एक विज्ञान की पत्रिका में यह भी बताया गया है कि पुरुषों की जनेन्द्रिय की पतली चमड़ी पर एच.आई.वी. संक्रमण ज्यादा कारगर तरीके से हमला करता है। ख़तना कराकर अगर चमड़ी को हटा दिया जाए तो संक्रमण का ख़तरा कम हो जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ख़तने के द्वारा एच.आई.वी. संक्रमण से बचाव हो सकता है, क्योंकि लिंग की बाहरी पतली झिल्ली एच.आई.वी. के लिए आसान शिकार है। ख़तना जनेन्द्रिय की झिल्ली के अन्दर जमा होने वाले पसेव (गंदगी) से तो बचाता ही है साथ ही पुरुष के पुरुषत्व को भी बढ़ाता है। इसका मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ख़तना के एड्स जैसी अन्य ख़तरनाक बीमारियों से बचाव के दूरगामी लाभ भी हो सकते हैं जो अभी मनुष्य की आंखों से ओझल हैं।
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खतने से घटता है सर्वाइकल कैंसर का खतरा

वाशिंगटन। हर परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण होता है। मुस्लिमों में बचपन में की जाने वाली खतना की रस्म [जननांग की ऊपरी चमड़ी को निकालना] को कई दुसाध्य बीमारियों से निपटने में बेहद कारगर बताया गया है। हाल में हुए एक शोध के मुताबिक खतना से एड्स व यौन संचारित वायरस के चलते होने वाले सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम में मदद मिलती है।

शोध में नवजात शिशुओं का खतना किए जाने से उन्हें भविष्य में यौन संचारित रोगों से बचाव की बात कही गई है। वर्साय यूनिवर्सिटी [फ्रांस] के डा. बेर्टन आवर्ट और उनके दक्षिण अफ्रीकी सहयोगियों ने अध्ययन के दौरान करीब 1200 पुरुषों का परीक्षण किया। अध्ययन में खतना वाले 15 फीसदी व बिना खतना वाले 22 फीसदी पुरुषों को ह्यूंमन पैपीलोमा वायरस [एचपीवी] से संक्रमित पाया गया। सर्वाइकल कैंसर सहित यौन संचारित रोगों [सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज] के पीछे एचपीवी को जिम्मेदार माना जाता है।

शोधार्थियों ने खतना करा चुके पुरुष के साथ यौन संबंध बनाने वाली महिलाओं को उन महिलाओं की तुलना में सर्वाइकल कैंसर का खतरा कम पाया जिन्होंने खतना नहीं कराने वाले पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाया।

इतना ही नहीं अमेरिका के बाल्टीमोर में अफ्रीकी-अमेरिकियों पर किए गए शोध में खतना कराने वाले 10 फीसदी पुरुषों के मुकाबले खतना नहीं कराने कराने वाले 22 फीसदी पुरुषों को एड्स से संक्रमित पाया गया। प्रमुख शोधकर्ता डा. रोनाल्ड ग्रे के मुताबिक अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी व हिस्पैनिक [लैटिन] पुरुषों में खतना की प्रथा कम पाई जाती है। इस कारण उनमें एड्स का खतरा ज्यादा पाया जाता है। दुनियाभर में हर साल 3.3 करोड़ लोग एड्स से संक्रमित होते हैं। वहीं पूरी दुनिया में प्रति वर्ष तीन लाख महिलाओं की सर्वाइकल कैंसर से मौत हो जाती है।

धन्‍यवाद 

http://in.jagran.yahoo.com/news/international/general/3_5_5081942.html/print/

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 female circumcision in islam
औरतों की खतना 
कुरआन में खतना का जिकर नहीं, दीने इबराहीम abrahamic religions अर्थात यहूद, इसाई और मुसलमान में आखरी पेगम्‍बर मुहम्‍मद सल्‍ल. ने इस्‍लाम में पिछले धर्मों की जिन अच्‍छी बातों को जारी रखा उनमें एक मर्दों की खतना है, 
महिलाओं की खतना का जिकर सही अहादीस में नहीं मिलता, जिन हदीसों को कमजोर हदीस माना गया है उनसे पता चलता है कि उस दौर में जिस व्‍यक्ति को बुरे अंदाज में पुकारना होता था तो कहा जाता था कि ''ओ महिलाओं की खतना करने वाली के बेटे'' अर्थात अच्‍छी बात नहीं समझी जाती थी,  लगभग सभी बडे मुस्लिम इदारों को इसको ना मानने पर इत्‍तफाक है इसी कारण यह केवल इधर उधर छोटी मोटी जगह पर कमजोर हदीसों पर अडे हुए या उनको इलाकाई रस्‍म व रिवाज पर अडे हुए लोगों जैसे की अफ्रीका आदि की सोच का नतीजा है, इंडिया पाकिस्‍तान बंग्‍लादेश यहां तक की अरब में भी यह बात मुसलमान भी नहीं जानते,  जानने पर हैरत का इजहार करते हैं,  इस लिए कुछ अडे हुए लोंगों की सोच का जिम्‍मेदार पूरी कौम को नहीं माना जा सकता, इधर कोई बुरी प्रथा नहीं जैसे कि सती प्रथा जिसे जबरदस्‍ती छूडवाया गया,

फिर भी जिसको यह बुरी प्रथा लगे वो मुस्लिम संस्‍थाओं की इस बात को फैलाए की इस बात को कमजोर हदीस का माना गया है इस लिए छोड दें
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Arya Samaj - अहिंसा परमो धर्मः ?

योग सूत्र’ के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंगों का वर्णन किया है। योग का पहला अंग ‘यम’ है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच को योग दर्शन में ‘यम’ कहा गया है।

‘अहिंसा सत्या स्तेय ब्रह्मचर्या परिग्रहा यमाः। (योग दर्शन, 2-30)

जैन मत में उक्त पाँचों को व्रत कहा गया है। अहिंसा जैन मत का मुख्य तत्व है। यहाँ अहिंसा का मतलब किसी प्राणी को बिना किसी उद्देश्य के नुकसान न पहुंचाना है। निष्प्रयोजन किसी प्राणी की हत्या करना या चोट पहुंचाना यहाँ तक कि क्लेश पहुंचाना एवं आत्मभाव पर आघात करना हिंसा है। निष्प्रयोजन किसी पेड़ की टहनियाँ तोड़ना भी हिंसा के अन्तर्गत आता है। मगर कुछ पंथों के प्रणेताओं ने हिंसा की मनमानी व्याख्या की है। ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’ का नारा देने वालों का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा पाप है चाहे वह प्रयोजनीय हो या निष्प्रयोजनीय। उक्त नारे का मूल निहितार्थ मांस भक्षण को निषिद्ध व पाप ठहराना था। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी के बाद महात्मा बुद्ध ने भी अहिंसा का उपदेश दिया।

गौतम बुद्ध का जन्म एक क्षत्रिय परिवार में 563 ई0पू0 लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। लुम्बिनी कपिलवस्तु के पड़ोस में है। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ श्रेष्ठतर जीवन मूल्यों की तलाश में 29 वर्ष की आयु में घर से निकल गए। 6 वर्ष तक सच्चाई की तलाश में भटकते हुए एक दिन उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए। गौतम बुद्ध के बाद भारतीय चिंतन में एक तूफ़ान-सा आ गया था, क्योंकि गौतम बुद्ध का सीधा टकराव वैदिक ब्राह्मणों से था।

वैदिक ब्राह्मण यज्ञ को प्रथम और उत्तम वैदिक संस्कार समझते थे। यह आर्यों का मुख्य धार्मिक कृत्य था। पशु बलि यज्ञ का मुख्य अंग थी। पशु बलि को बहुत ही पुण्य का कर्तव्य समझा जाता था। गौतम बुद्ध ने जब देखा कि आर्य लोग यज्ञ में निरीह पशुओं की बलि चढ़ाते हैं, तो यह देखकर उनका हृदय विद्रोह से भर उठा। आर्य धर्म के विरूद्ध उठने वाली क्रांति का प्रमुख कारण वैदिक पुरोहितवाद और हिंसा पूर्ण कर्मकांड ही था। 
 ईसा से करीब 500 वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया था वह यह था कि, 

‘‘पशु बलि का पुण्य कार्य और पापों के प्रायश्चित से क्या संबंध ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है ?’’


यह एक विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध के करीब 2350 वर्ष बाद आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के प्रकांड पंडित स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस्लाम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया है वह यह है कि 

‘‘यदि अल्लाह प्राणी मात्र के लिए दया रखता है तो पशु बलि का विधान क्यों कर धर्म-सम्मत हो सकता है ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है।’’ 


कैसी अजीब विडंबना है कि जो सवाल गौतम बुद्ध ने वैदिक ऋषियों से किया था, वही सवाल करीब 2350 वर्ष बाद एक वैदिक महर्षि मुसलमानों से करता है। जो आरोप गौतम बुद्ध ने आर्य धर्म पर लगाया था, वही आरोप कई ‘शताब्दियों बाद एक आर्य विद्वान इस्लाम पर लगाता है।

धर्म का संपादन मनुष्य द्वारा नहीं होता। धर्म सृष्टिकर्ता का विधान होता है। धर्म का मूल स्रोत आदमी नहीं, यह अति प्राकृतिक सत्ता है। यह भी विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व का इंकार करके वैदिक धर्म को आरोपित किया था, मगर स्वामी दयानंद सरस्वती ने ईश्वर के अस्तित्व का इकरार करके इस्लाम को आरोपित किया है। 

प्राचीन भारतीय समाज में पशु बलि के साथ-साथ नर बलि की भी एक सामान्य प्रक्रिया थी। यज्ञ-याग का समर्थन करने वाले वैदिक ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं कि न केवल पशु बलि बल्कि नर बलि की प्रथा भी एक ठोस इतिहास का परिच्छेद है। यज्ञों में आदमियों, घोड़ों, बैलों, मेंढ़ों और बकरियों की बलि दी जाती थी। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है कि यज्ञ का सार पहले मनुष्य में था, फिर वह अश्व में चला गया, फिर गो में, फिर भेड़ में, फिर अजा में, इसके बाद यज्ञ में प्रतीकात्मक रूप में नारियल-चावल, जौ आदि का प्रयोग होने लगा। आज भी हिंदुओं के कुछ संप्रदाय पशु बलि में विश्वास रखते हैं। 

वेदों के बाद अगर हम रामायण काल की बात करें तो यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि श्री राम शिकार खेलते थे। जब रावण द्वारा सीता का हरण किया गया, उस समय श्री राम हिरन का शिकार खेलने गए हुए थे। उक्त तथ्य के साथ इस तथ्य में भी कोई विवाद नहीं है कि श्रीमद्भागवतगीता के उपदेशक श्री कृष्ण की मृत्यु शिकार खेलते हुए हुई थी। यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि क्या उक्त दोनों महापुरुष हिंसा की परिभाषा नहीं जानते थे ? क्या उनकी धारणाओं में जीव हत्या जघन्य पाप व अपराध नहीं थी ? क्या शिकार खेलना उनका मन बहलावा मात्र था ?

अगर हम उक्त सवाल पर विचार करते हुए यह मान लें कि पशु बलि और मांस भक्षण का विधान धर्मसम्मत नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्‍वर अत्यंत दयालु और कृपालु है, तो फिर यहाँ यह सवाल भी पैदा हो जाता है कि जानवर, पशु, पक्षी आदि जीव हत्या और मांस भक्षण क्यों करते हैं। अगर अल्लाह की दयालुता का प्रमाण यही है कि वह जीव हत्या और मांस भक्षण की इजाजत कभी नहीं दे सकता तो फिर शेर, बगुला, चमगादड़, छिपकली, मकड़ी, चींटी आदि जीवहत्या कर मांस क्यों खाते हैं ? क्या शेर, चमगादड़ आदि ईश्वर की रचना नहीं है ?

शेर को जंगल का राजा कहा जाता है, वह जानवरों पर इतनी बेदर्दी और बेरहमी से हमला करता है कि जानवर दहाड़ मारने लगता है। मांसाहारी चमगादड़ों की एक बस्ती में लगभग 2 करोड़ तक चमगादड़ें होती हैं। अगर चमगादड़ की एक बस्ती के एक रात के भोजन का अनुमान लगाये तो 2 करोड़ की एक बस्ती एक रात में करीब 2500 कुंतल कीड़ों, कीटों आदि को चट कर जाती हैं। अगर इन कीड़ों, कीटों की तादाद का अनुमान लगाया जाए तो यह तादाद करीब 1000 करोड़ से अधिक होती है। यह तो एक मामूली-सा उदाहरण मात्र है, यह दुनिया बहुत बड़ी है और इस जमीनी दुनिया से कहीं अधिक विस्तृत और विशाल तो समुद्री दुनिया है जहाँ एक जीव पूर्ण रूप से दूसरे जीव पर निर्भर है।

विश्व के मांस संबंधी आंकड़ों पर अगर हम एक सरसरी नज़र डालें तो आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन 8 करोड़ मुर्गियां, 22 लाख सुअर, 13 लाख भेड़-बकरियां, 7 लाख गाय, करोड़ों मछलियां और अन्य पशु-पक्षी मनुष्य का लुकमा बन जाते हैं। कई देश तो ऐसे हैं जो पूर्ण रूप से मांस पर ही निर्भर हैं। अब अगर मांस भक्षण को पाप व अपराध मान लिया जाए तो न केवल मनुष्य का जीवन बल्कि सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जीव-हत्या को पाप मानकर तो हम खेती-बाड़ी का काम भी नहीं कर सकते, क्योंकि खेत जोतने और काटने में तो बहुत अधिक जीव-हत्या होती है।

विज्ञान के अनुसार पशु-पक्षियों की भांति पेड़-पौधों में भी जीवन Life है। अब जो लोग मांस भक्षण को पाप समझते हैं, क्या उनको इतनी-सी बात समझ में नहीं आती कि जब पेड़-पौधों में भी जीवन है तो फिर उनका भक्षण जीव-हत्या क्यों नहीं है? फिर मांस खाने और वनस्पति खाने में अंतर ही क्या है ? यहाँ अगर जीवन Life ; और जीव Soul; में भेद न माना जाए तो फिर मनुष्य भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की श्रेणी में आ जाता है। जीव केवल मनुष्य में है इसलिए ही वह अन्यों से भिन्न और उत्तम है।

विज्ञान के अनुसार मनुष्य के एक बार के वीर्य Male generation fluid स्राव (Discharge) में 2 करोड़ ‘शुक्राणुओं (Sperm) की हत्या होती है। मनुष्य जीवन में एक बार नहीं, बल्कि सैकड़ों बार वीर्य स्राव करता है। फिर मनुष्य भी एक नहीं करोड़ों हैं। अब अगर यह मान लिया जाए कि प्रत्येक ‘शुक्राणु (Sperm) एक जीव है, तो इससे बड़ी तादाद में जीव हत्या और कहां हो सकती है ? करोड़ों-अरबों जीव-हत्या करके एक बच्चा पैदा होता है। अब क्या जीव-हत्या और ‘‘अहिंसा परमों धर्मः’’ की धारणा तार्किक और विज्ञान सम्मत हो सकती है।

 जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ जीव (Soul) हो यह ज़रूरी नहीं। वृद्धि- ह्रास , विकास जीवन (Life) के लक्षण हैं जीव के नहीं। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। आत्मा एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक विश्वगत अस्तित्व (Individual Existence) है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।