Sunday, 28 August 2016

डाक्‍टर मुहम्‍मद असलम क़ासमी

महेंदर पाल आर्य

दूसरों के कन्धों पर बैठ  कर खुद को बड़ा दिखाने वालों की कमी नहीं है ऐसे ही  साहब हैं महेंदर पाल आर्य ,वह बताते हैं की जनाब किसी मस्जिद में इमामत करते थे ,बेचारे ग़रीब इमाम की औक़ात भी क्या  होती  जिसका  बस  घरवाली पर नहीं चलता वह इमाम पर गुस्सा उतार लेता है ,इन गरीबों को खाना भी अलगअलग  घरों से  मिलता है वह भी मिला मिला, न मिला ,महेंद्र  ने सोचा  क्यों न कारोबार बदला जाए ,तो जनाब महेन्द्रपाल आर्य होगये ,खुद   ही बताते है की पहले उनका नाम महबूब अली था ,चलो पहुंची वहीँ पे ख़ाक जहाँ का खमीर था ,बेहतर हुआ कि जनाब ने जल्द ही  मस्जिद  छोड़ दी वरना जैसी अक़्ल रखते थे न  जाने कितनो का इमान खराब करते ,वह जो कक्षा १ मे बच्चों को पढ़ाया जाता है न, क, से कबूतर ,जब बच्चा अगली कक्षाओं  में जाता है तो उससे उम्मीद  की जाती है कि  वह इस बात को खुद समझ जाये कि  ,क ,से कबूतर का क्या मतलब है और वह यह ज़िद न करने लगजाये कि, क ,से कबूतर ही होता है क से क़लम या क्लास या कुछ और नहीं बन सकता ,बस यही हाल  है जनाब का ,कहते है कि अल्लाह ने कहा  है कि , छ दिनों में उसने सृष्टि को रचा है तो यह बताओ कि सूरज नहीं  था तो दिन का   पता  कैसे चला ,अरे वाह पंडित जी ज्ञानी हो तो ऐसा हो,अरे मेरे भोले पंडित अल्लाह ताला काल और आकाश से परे है उसे इंसानी दिनों से क्या सरोकार ? यहां तुम्हारे जैसे भोले मानव को यह समझाया गया है कि उसने सृष्टि को छ पिरयड में बनाया है जब कि  वह चाहता तो एक शब्द कुन से सृष्टि को बना सकता था ,पंडित जी तुम्हारी यही अदाएं तो यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे कहदूं तुम मोलवी थे तुम ने अल्लाह को अर्श पर बिठा कर यह प्रश्न दाग दिया कि  अल्लाह बड़ा  है या अर्श ,अरे महाशय  कहा न कि  वह काल  व् आकाश से परे है उसे बैठने उठने से कोई सरोकार नहीं है,उठना बैठना ,सोना जागना यह सब इंसानी सिफ़ात  हैं ईश्वर तो इन सब से परे  है,  

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