Saturday, 24 September 2016

स्वामी जी को सफलता नहीं मिली

स्वामी जी को सफलता नहीं मिली

    स्वामी दयानन्द जी ने देखा कि हिन्दू समाज को धर्म के नाम पर पाखण्ड, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का शिकार बना दिया गया है। वह ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और धर्म के मर्म से वंचित हो गया है। अज्ञानी लोगों ने धर्म को व्यवसाय बना लिया है। वे मूर्तिपूजा और ग्रहपूजा के नाम पर लोगों से रूपया वसूल कर रहे हैं। स्वामी जी ने अपनी जान ख़तरे में डाली और धर्म के धंधेबाज़ों का विरोध किया। निःसंदेह यह उनका अच्छा प्रयास था लेकिन उनकी कोशिशों से मूर्तिपूजा और ग्रहपूजा आदि बंद नहीं हुई।
स्वामी दयानन्द जी सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि वसुओं और सृष्टि की उत्पत्ति से परमेवर का वास्तविक प्रयोजन नहीं जान पाए।
स्वामी जी वेद और मनु-स्मृति की रचना काल जानने में भी असफल रहे।
स्वामी जी ने मनुष्य की उत्पत्ति का जो काल बताया है, उसे भी आधुनिक विज्ञान ने ग़लत सिद्ध कर दिया है।
स्वामी जी मानते थे कि हिन्दू समाज का भला वर्ण व्यवस्था की ऊँचनीच और छूतछात को मानने में है। इसीलिए उन्होंने वैदिक धर्म के नाम पर वर्ण व्यवस्था की स्थापना की कोशिश की लेकिन वह इस काम में भी सफल न हो सके।
न्याय के लिए अपने ही वर्ण के गवाहों को लाने और क़ातिल को बिना विचारे मार डालने की बात कहकर वह न्याय की अवधारणा को समझने और समझाने में भी असफल रहे।
स्वामी जी अपना वास्तविक जन्म स्थान और जाति छिपाने में सफल रहे।
स्वामी जी का बताया वेदमंत्र भी यजुर्वेद में नहीं मिल पाया।
वह अपने कल्पित वेदार्थ के अनुसार गुदा से सांप लेने में भी असफल रहे।
स्वामी जी श्वास-प्रश्वास की भांति सुबह-शाम हवन करने में भी असफल रहे।
अग्नि आदि तत्वों की उत्पत्ति को भी वह समझ न पाए और ग़लत विवरण देकर चले गए।
वह अमर भी न हो पाए और न ही मृत्यु समय के कष्टों से बच पाए।
न उन्हें कोई ‘योगी गुरु’ मिला और न ही उन्हें ‘सच्चे शिव’ के दर्शन हुए, जिसके लिए वह घर से निकले थे।
वेदों को भी वह समझ नहीं पाए और ग़लत अर्थ कर गए।
संसार के क़ैदखाने से भी किसी को मुक्ति न दिला सके बल्कि वह खुद ही मुक्ति न पा सके।
हिन्दू धर्म नगरियों के विद्वानों से उन्होंने शास्त्रार्थ ज़रूर किया लेकिन किसी एक नगर के विद्वानों से या आम नागरिकों से भी वह अपनी मान्यताएं मनवाने में असफल रहे।
उन्होंने अपने शिष्यों से अपनी मान्यताओं का पालन करवाने में असफल रहने को भी स्वयं स्वीकार किया है।
वह अपने प्राण गंवाने का कारण भी न बता पाए।
उनका वेदभाष्‍य भी अधूरा ही रह गया।
उन्होंने दूसरा जन्म लेकर उसे पूरा करने की बात कही लेकिन वह दूसरा जन्म भी यहां नहीं ले पाए क्योंकि आवागमन होता नहीं है।
उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की लेकिन वह भी अपनी स्थापना के उद्देश्य से भटक गया है-
‘किन्तु हमारी शिरोमणि सभा अभी तक हठतावश मयासुर के मार्ग पर चल रही है।’ (उपक्रमणिका, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पृष्ठ 8)

-- --Book Download Link-Midiafire.com-

http://www.mediafire.com/download/ydp77xzqb10chyd/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya-paya-second-edition.pdf --
डा. अनवर जमाल की पुस्तक "'स्वामी दयानंद जी ने क्या खोजा? क्या पाया?" परिवर्धित संस्करण  PDF इधर से भी डाउनलोड की जा सकती है --पुस्तक में108 प्रश्न नंबर ब्रेकिट में दिये गए हैं
https://archive.org/stream/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya-paya-published-book/swami-dayanand-ji-ne-kiya-khoja-kiya-paya-second-edition#page/n0/mode/2up
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पुस्तक युनिकोड में चार पार्ट में इधर भी है
 http://108sawal.blogspot.in/2015/04/swami-dayanand-ne-kiya-khoja-kiya-paya.html

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